सरस्वती मेला।

नमस्कार दोस्तों! स्वागत है आपका हमारे चैनल पर। आज हम बात करेंगे पकरैल पंचायत (जो की गोगरी ब्लॉक और खगरिया) की सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल हिस्सा – सरस्वती पूजा के मेले के बारे में। बसंत पंचमी का दिन, जब विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा होती है, तो पूरे पंचायत में इसको लेकर खास व्यवस्था जोरो शोरो पर की जाती है, वही अगर हम बात करे तो बिहार , बंगाल, ओडिशा और पूर्वी भारत में इस पूजा को लेकर बहुत तैयारियां किया जाता है। कई जगहों पैर इस पुय्जा को लेकर मेले का आयोजन भी किया जाता है। यह पूजा ही नहीं, बल्कि एक विशाल मेला भी होता है, जो ज्ञान, संगीत, कला और व्यापार का संगम बन जाता है। आइए, जानते हैं इस मेले के आयोजन की पूरी कहानी।

तैयारी और आयोजन की शुरुआत
सरस्वती पूजा का मेला कोई साधारण आयोजन नहीं होता। यह महीनों पहले से शुरू हो जाता है। स्थानीय पंडाल कमिटी या पूजा समिति सबसे पहले जगह का चयन करती है। शहरों में बड़े मैदान, स्कूल ग्राउंड या पार्क, और गांवों में खुली जगहें चुनी जाती हैं। बजट तय होता है – जिसमें पंडाल बनाना, मूर्ति लाना, सजावट और सुरक्षा व्यवस्था शामिल होती है।

सरकार और स्थानीय प्रशासन से अनुमति ली जाती है। ट्रैफिक प्लान, बिजली-पानी की व्यवस्था और फायर सेफ्टी का ध्यान रखा जाता है। मूर्तिकारों को बुलाया जाता है, जो मिट्टी से मां सरस्वती की सुंदर प्रतिमा बनाते हैं। पंडाल को फूलों, लाइट्स और पारंपरिक बंगाली मोटिफ से सजाया जाता है। मेले के लिए स्टॉल लगाने वाले व्यापारियों को आमंत्रित किया जाता है – किताबें, मीणा बाजार , खिलौने, मिठाई, हस्तशिल्प और खाने-पिने की दुकानें।

आयोजन समिति में युवा स्वयंसेवक बड़ी भूमिका निभाते हैं। वे सोशल मीडिया पर प्रचार करते हैं, स्पॉन्सर ढूंढते हैं और वॉलंटियर्स को ट्रेनिंग देते है
मेले का मुख्य आकर्षण

बसंत पंचमी की सुबह पूजा से मेला जोर पकड़ता है। बच्चे किताबें और पेन छूकर आशीर्वाद लेते हैं – यह परंपरा है कि देवी की कृपा से पढ़ाई में मन लगे। फिर शुरू होता है मेला का जलवा!

खेल-तमाशा: झूले , चकरी और रिंग गेम्स। बच्चे-बूढ़े सब झूम उठते हैं।

खान-पान स्टॉल: रसगुल्ला, संदेश, पुठी (मीठे चावल), चाट-पकौड़े। बंगाली स्ट्रीट फूड का स्वाद लाजवाब!

खरीदारी का बाजार: किताबों की दुकानें सबसे लोकप्रिय। नई-पुरानी किताबें, कॉमिक्स, नोटबुक। हस्तशिल्प जैसे कांथा स्टिच साड़ी, ज्वेलरी बिकती हैं।

सांस्कृतिक कार्यक्रम: शाम को रवींद्र संगीत, नृत्य, नाटक। लोकल आर्टिस्ट शो करते है।

यह मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक है। विभिन्न समुदाय मिलते हैं, व्यापार फलता-फूलता है। पर्यटक भी आकर्षित होते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।

चुनौतियां और सुरक्षा

मेले में लाखों लोग आते हैं, इसलिए चुनौतियां भी हैं। भीड़ प्रबंधन के लिए पुलिस तैनात होती है। प्लास्टिक-मुक्त अभियान चलाया जाता है। वर्षा या महामारी में कैंसिलेशन का खतरा रहता है। फिर भी, समिति इनका सामना करती है।

महत्वपूर्ण है धार्मिक संवेदनशीलता – मूर्ति विसर्जन शांतिपूर्ण हो। एनजीओ क्लीन-अप ड्राइव चलाते हैं।

विरासत की निरंतरता

सरस्वती पूजा का मेला ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है, जो हमें सिखाती है – विद्या ही जीवन का आधार है। अगले साल फिर मिलेंगे इस उत्सव में। धन्यवाद! जय मां सरस्वती!

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