🐄 1. पशुधन का बड़ा केंद्र
खगड़िया गोशाला मेला केवल मेला नहीं, बल्कि उत्तरी बिहार का प्रमुख पशु व्यापार केंद्र माना जाता है। यहाँ देशी गाय, भैंस, बछड़े और उन्नत नस्लों की खरीद–फरोख्त होती है।

🌾 2. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़
यह मेला किसानों और पशुपालकों की सालाना आय का बड़ा जरिया है। कई परिवार पूरे साल इसी मेले की तैयारी करते हैं।
🎡 3. मेले का रंग-बिरंगा रूप
पशुओं के साथ-साथ
- झूले
- सर्कस
- मौत का कुआँ
- जादू शो
- मिठाइयों और खिलौनों की दुकानें
मेले को परिवारिक उत्सव बना देती हैं।
🧑🌾 4. पारंपरिक ज्ञान का आदान–प्रदान
यहाँ पशुपालक
- पशुओं के इलाज
- देसी चारे
- दूध बढ़ाने के पारंपरिक नुस्खे
आपस में साझा करते हैं, जो आधुनिक कृषि ज्ञान का लोक रूप है।
🕉️ 5. धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव
“गोशाला” नाम होने के कारण मेला गौ-सेवा और धार्मिक आस्था से भी जुड़ा है। कई लोग इसे पुण्य कार्य मानकर दान करते हैं।
🗣️ 6. राजनीति और प्रशासन की मौजूदगी
अक्सर स्थानीय नेता और प्रशासनिक अधिकारी भी मेले में आते हैं, जिससे यह मेला सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का मंच भी बन जाता है।
🕰️ 7. दशकों पुरानी परंपरा
स्थानीय मान्यता के अनुसार यह मेला कई दशकों से लगातार लग रहा है और खगड़िया की पहचान बन चुका है।
खगड़िया का यह गोशाला मेला दूर-दराज़ के जिलों से आए पशुपालकों को आकर्षित करता है।
यहाँ देशी गाय, भैंस, बछड़े और उन्नत नस्लों के पशु देखने को मिलते हैं।
मेले में हर दिन लाखों रुपये का पशु व्यापार हो रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
गोशाला मेला सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है।
झूले, सर्कस, मौत का कुआँ, जादू शो और खिलौनों की दुकानों ने इसे परिवारिक उत्सव बना दिया है।
बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लिए यहाँ मनोरंजन की पूरी व्यवस्था है।
